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झारखंड के छोटे से गांव, मुटकू से युवा एथलीट, रिंकू  दूसरी पीटी ऊषा बनने की राह पर दौड़ रही है। उम्र है केवल चौदह साल, लेकिन इस छोटी सी उम्र में वह सौ से अधिक की संख्या में मेडल जीत चुकी हैं। गरीबी के कारण संसाधनों की कमी के बावजूद, इस युवा एथलीट के सपने आसमान को छू रहे हैं।

पिता किसान हैं, ट्रेनिंग के लिए पैसों की कमी है। न दौड़ने के लिए ट्रैक और ना ही ट्रेन करने के लिए कोच। गांव में ही ऊबड़-खाबड़ जमीन पर दौड़ने पर मजबूर है रिंकू। जज़्बा सलामी के योग्य इसलिए है क्योंकि वो डोमेस्टिक और राज्य स्तर पर काफ़ी संख्या में पदक अपने नाम कर चुकी हैं।

राष्ट्रीय जूनियर एथलेटिक्‍स चैंपियनशिप में जीता है पदक

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उनकी ख़ास उपलब्धियों में से एक, उनका 31वीं राष्ट्रीय जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी पदक जीतना रहा। सुविधाएं पाने को रिंकू, सरकार से गुहार लगा रही हैं। रिंकू का कहना है कि,

मैं शहर में स्थित अंतरराष्ट्रीय स्तर के ट्रैक पर अभ्यास करना चाहती हूं। मेरा हमेशा एक ही लक्ष्य होता है कि जो भी मेरे खिलाफ़ दौड़े, मैं उसे पीछे छोड़ दूं।

बता दें कि उनके पिता का भी एक सफ़ल एथलीट बनने का सपना था, लेकिन गरीबी और संसाधनों की कमी के कारण उनका यह सपना पूरा न हो सका। उनके पिता, राजेश ख़ुद के सपने को साकार करने के लिए रिंकू को हमेशा से बढ़ावा देते रहे हैं।

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अगली पीटी ऊषा बनाना चाहते हैं अपनी बेटी को

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रिंकू के पिता कहते हैं,

जमशेदपुर को खेल नगरी भी कहा जाता रहा है। लेकिन मेरी प्रतिभा की धनी बेटी के लिए या अन्य युवाओं की सुध लेने वाला तक यहां कोई नहीं है।

राज्य सरकार द्वारा युवा खिलाडि़यों को बढ़ावा देने हेतु, जिला स्तर पर उपायुक्त की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गयी थी। लेकिन सब बेसुध पड़े हैं। युवाओं के प्रोत्साहन के लिए उन्हें कोई सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जा रही।राजेश अपनी बेटी को देश की अगली पीटी ऊषा बनते देखना चाहते हैं।

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